मल्हार बना इतिहास का केंद्र, 'मन की बात' में गूंजा स्वर्ण युग; ताम्र पट्टिकाओं ने खोले नए रहस्य

मल्हार बना इतिहास का केंद्र, 'मन की बात' में गूंजा स्वर्ण युग; ताम्र पट्टिकाओं ने खोले नए रहस्य

मल्हार बना इतिहास का केंद्र, 'मन की बात' में गूंजा स्वर्ण युग; ताम्र पट्टिकाओं ने खोले नए रहस्य

एक्सपर्टस के अनुसार, ये ताम्र पट्टिकाएं लगभग 1400 से 1500 साल पुरानी हो सकती हैं और इन्हें छठी से सातवीं शताब्दी के बीच का माना जा रहा है.

इतिहासकार इन अभिलेखों को पांडुवंशी शासक महाशिवगुप्त बालार्जुन के शासनकाल से जोड़कर देख रहे हैं. इन पट्टिकाओं में प्राचीन ब्राह्मी लिपि और पाली भाषा का इस्तेमाल किया गया है. इनमें उस समय की शासन व्यवस्था, भूमि दान, धार्मिक कार्यों और सामाजिक गतिविधियों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी दर्ज है.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
एक्सपर्टस का मानना है कि ऐसे अभिलेख किसी भी क्षेत्र के इतिहास, संस्कृति और समाज को समझने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. इनके अध्ययन से यह पता चलता है कि उस समय लोग कैसे रहते थे, प्रशासन कैसे चलता था और धार्मिक जीवन कैसा था. मल्हार से मिली यह खोज इसलिए भी खास मानी जा रही है क्योंकि यह क्षेत्र प्राचीन दक्षिण कोसल का हिस्सा रहा है, जिसे ऐतिहासिक रूप से एक समृद्ध और विकसित क्षेत्र माना जाता है. महाशिवगुप्त बालार्जुन के शासनकाल को भी दक्षिण कोसल का स्वर्णिम युग कहा जाता है.

छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास
इन ताम्र पट्टिकाओं के विस्तृत अध्ययन से इतिहासकारों को उस समय के प्रशासन, शिक्षा प्रणाली, धर्म और समाज के बारे में नई और महत्वपूर्ण जानकारी मिलने की उम्मीद है. इससे छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास के कई अनछुए पहलुओं पर से पर्दा उठ सकता है. फिलहाल, यह खोज पुरातत्वविदों और इतिहासकारों के लिए एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है और मल्हार एक बार फिर अपनी ऐतिहासिक विरासत के कारण चर्चा में आ गया है.